20 अक्टूबर 2018 - 15:29
इस्राईल को पता है कि समीकरण बदल चुके हैं, युद्ध हुआ तो तेल अबीब के हाथ पांव कट जाएंगे!

सीरिया संकट अपनी समाप्ति के क़रीब पहुंच चुका है। जार्डन से मिलने वाली इस देश की सीमा खुल चुकी है और जार्डन से भारी संख्या में लोग सीरिया आ रहे हैं और अपनी ज़रूरत का सामान ख़रीद कर लौट रहे है।

इराक़ से लगने वाली सीरिया की सीमा भी खोलने की तैयारियां तेज़ हो गई हैं। इन हालात में एक बहुत बड़ा बदलाव यह है कि पश्चिमी एशिया के इलाक़े में अमरीका, इस्राईल और उसके घटकों की नीतियों और योजनाओं को एक बड़ा झटका लगा है। ऊर्जा का केन्द्र समझा जाने वाला यह इलाक़ा अमरीका तथा अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के ध्यान का केन्द्र रहा है। इन शक्तियों की यह कोशिश रही है कि इस पूरे इलाक़े में वही सरकारें सत्ता में रहें जो पश्चिमी देशों के हितों का ख़याल रखें। इसके लिए साम्राज्यवादी शक्तियों ने यह नीति अपनाई की कि हर सरकार की कमज़ोरियों पर नज़र रखी और इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया। मगर इस समय हालात न अमरीका के कंट्रोल में हैं और न उसके घटकों की चल पा रही है।

सीरिया और इराक़ के राजनैतिक और सामरिक परिवर्तनों को अपनी मुट्ठी में करने की अमरीका और उसके पश्चिमी व क्षेत्रीय घटकों ने लंबी योजना बनाई थी। इन देशों को कई भागों में बांट देने की बातें अमरीकी कांग्रेस में खुलकर हुईं मगर ज़मीनी हालात और राजनैतिक व सामरिक परिवर्तनों का रुख़ अलग रहा जिसके नतीजा आज यह है कि पश्चिमी एशिया के इलाक़े के हालात पर नज़र रखने वाले विशलेषक इस बिंदु पर एकमत हैं कि पश्चिमी एशिया का इलाक़ा धीरे धीरे अमरीका के हाथ से निकल चुका है। अमरीका अपनी नीतियों के कारण इस इलाक़े में अपना प्रभाव और अपनी पैठ गवां चुका है और इसके नतीजे में अमरीका के घटकों की हालत भी पतली हो गई है। इस समय इस्राईल गज़्ज़ा में हर शुक्रवार को होने वाले प्रदर्शनों से परेशान है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर इस्राईली सैनिक हमले करते हैं जिनमें फ़िलिस्तीनी प्रदर्शनकारी शहीद और घायल होते हैं। मंगर प्रदर्शनों की तीव्रता और व्य्याियों पर इस्राईली सैनिक हमले करते हैं जिनमें फ़िलिस्तीनी प्रदर्शनकारी शहीद और घायल होते हैं। मंगर पपकता में कोई कमी नहीं आ रही है।

इस्राईली अधिकारियों ने ग़ज़्ज़ा के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने क धमकी भी दी और यह ख़बरें भी आईं कि इस्राईली मंत्रिमंडल की सुरक्षा कमेटी की 6 घंटी की लंबी बैठक हुई जिसमें यह फ़ैसला किया गया कि फ़िलिस्तीनियों के प्रदर्शनों को हर क़ीमत पर कुचलना है मगर फ़िलिस्तीनी संगठनों ने चेतावनी दी है कि यह इस्राईल ने युद्ध शुरू किया तो उसे भयानक ख़मियाज़ भुगतना पड़ेगा।

फ़िलिस्तीनी संगठनों के बयानों से हटकर देखा जाए तो इस्राईल के भीतर भी विशेषज्ञों और टीकाकारों का यह कहना है कि फ़िलिस्तीनी संगठनों की शक्ति में बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है और अब इस्राईल के लिए संभव नहीं रहा है कि वह युद्ध शुरू करे और उस युद्ध से वह परिणाम हासिल कर ले जो इसकी इच्छा है। अर्थात इस्राईल युद्ध शुरु तो कर सकता है लेकिन उसे रोकना इस्राईल के बस की बात नहीं होगी।

इसीलिए इस्राईली विशेषज्ञ भी सरकार को चेतावनी दी है कि कोई भी क़दम उठाने से पहले ज़रूरी है कि उसके परिणामों के बारे में भलीभांति सोच लिया जाए।

पूरे पश्चिमी एशिया के हालात का जो रुख़ है उसमें यह साफ़ नज़र आ रहा है कि अमरीका या उसके घटकों के लिए अब इस इलाक़े में मनमाने रूप से गतिविधियां कर पाना संभव नहीं रहेगा। इस बीच सबसे अधिक चिंता इस्राईल को है जो एक ग़ैर क़ानूनी शासन है। फ़िलिस्तीन की धरती पर अवैध क़ब्ज़ा करके इस्राईल का गठन तो कर दिया गया है लेकिन 70 साल बाद भी इस्राईल के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि दुनिया के सारे देशों से उसे मान्यता मिल जाए।

इस्राईल ने कुछ अरब सरकारों से सांठ गांठ भी कर ली है मगर जनता के बीच आज भी इस्राईल को उन देशों में भी अवैध शासन के रूप में ही देखा जाता है जहां की सरकारें इस्राईल को मान्यता देती हैं। अतः इस्राईल का पूरा अस्तित्व साज़िश, सांठगांठ और हिंसा पर आधारित है जो यह बात इस्राईली अधिकारी ख़ुद भी जानते हैं कि इस रूप में और इन हालात में इस्राईल के ग़ैर क़ानूनी अस्तित्व को जारी रख पाना उनके लिए संभव नहीं है।